Tuesday, July 13, 2010

आसान नहीं है

आसान नहीं है
मुझसे पार पाना
मैं जेठ की गरम लूक हूँ
और दिसम्बर की पाला-मार हवा।
मैं अंधेरे में झुका हुआ
केले का नरम पत्ता हूँ
जिसे चीर जाती है
उतावली हवा
मुहब्बत में।
मैं तमाम जंगलों से दूर
तन कर खड़ा बर का पेड़ हूँ
अपने गाँठों-भरे तने को फैलाता हुआ।
मैं गेहुएँ रंग का पत्थर हूँ
पर उस पर खुदा हुआ
झूठा बखान नहीं हूँ
आसान नहीं है
मुझसे पार पाना।

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